प्रेम करना है तो होने लगो आशिक,
जितना प्रेम भीतर रहता है,
जितना प्रेम भीतर बसता है,
जितना प्रेम भीतर मिलता है,
जितना प्रेम भीतर भर जाता है,
आशिक अपने हृदय में फिर आगे बढ़ता नहीं है,
बल्कि स्वतंत्र प्रेम करने लगता है,
वह स्वतंत्र प्रेम साक्षी भाव से देखता है,
अपने प्रेमी को,
उसे लगता है,
हर होने वाली घटना किसी का प्रेम किसी का भला है।
- ललित दाधीच
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