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आश्चर्यचकित अचंभित परिवेशों में

                
                                                         
                            मिलते हो कभी कुछ लम्हों में,
                                                                 
                            
न जाने कहाँ गुम हो जाते हो!
देते हो सदा सुख पलकों को,
फिर क्षण में ओझल हो जाते हो!!
सूनेपन में,
कुछ आहट से,
चौंक उठता हूँ,
बिखरी हुई,
अनुभूति को,
क्षण में पिरोता हूँ!!
चंचलता, चपलता, मुस्कुराता चेहरा,
लेकर तुम मेरे सामने आ जाते हो!
देते हो सदा सुख पलकों को,
फिर क्षण में ओझल हो जाते हो!!
मिलते हो.............................
परिवर्तन से,
यह जग,
सारा चलता है,
पर तुम्हें देखने को,
मन सदा ही,
'लालायित रहता है
आश्चर्यचकित अचंभित परिवेशों में,
झट से तुम प्रकट हो जाते हो!
देते हो सदा सुख पलकों को,
फिर क्षण में ओझल हो जाते हो!!
मिलते हो कभी कुछ लम्हों में,
न जाने कहाँ गुम हो जाते हो!
देते हो सदा सुख पलकों को,
फिर क्षण में ओझल हो जाते हो!!
-लक्ष्मण झा ‘परिमल’
 
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एक घंटा पहले

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