लोग मुझे गधा ही नहीं समझते थे,
वे सब मुझे गदहा कहने लगे।
क्या करूँ, मेरी सूरत ही ऐसी थी।
कभी बोलता था तो मेरी आवाज हकलाने लगती थी,
कभी तो सुनने वालों को हेंचों-हेंचों सुनाई देती थी।
कभी लिखकर कोई लेख-कविता पोस्ट करना मुश्किल हो जाता था,
लोग कम पढ़ते थे, मज़ाक अधिक बन जाता था।
सबको मेरी रचना में मेरी पूँछ नज़र आती थी,
कभी यदि गाने का रियाज़ करने लगा तो
हेंचों-हेंचों की आवाज कानों में गूँज जाती थी।
सब दूर मुझसे रहते थे,
सब बेवकूफ गदहा कहते थे।
पर सब गधे के दिन बदलते हैं,
यह बात लोग सदियों से कहते हैं।
मेटा ने मेरा रंग-रूप बदला,
मुझे सलमान बना दिया,
अब सब मुझे निहारने लगे,
AI ने मुझे हीरो बना दिया।
लोग जुड़ने लगे,
हजारों मेरे फ्रेंड बनने लगे,
मेरी लेखनी को सब पढ़ने लगे,
कविताओं को अब सुनने लगे,
मेरे तुतलाने को अब लोग अंदाज़ कहने लगे!
पर यह पहचान सलमान की अधिक नहीं चली,
कुछ दिनों के बाद मंच पर गाने लगा,
हकलाना और हेंचों-हेंचों की आवाज छुपा न सका,
राज़ खुल गया,
गधा दुम दबाकर भाग गया।
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