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छपेगी एक दिन मेरी भी किताब

chapegi Ek din meri kitab bhi
                
                                                         
                            छपेगी एक दिन मेरी भी किताब
                                                                 
                            

छपेगी एक दिन
मेरी भी किताब
मसरूफी में भी
लिखता रहा हूँ जनाब
चुपचाप केवल शब्दों से
सोखता रहा अतीत की नमी को
इस आस से कभी तो
वर्तमान में होगा प्रकाश
अंकुरित होते शब्दों पर
नव-पल्लव आयेंगे
ये शब्दों के पौधे
जरूर वृक्ष बन जायेंगे
वृक्षों से तैयार होगा
एक सदाबहार वन
कभी तो इस वन में भी
घूमने लोग आयेंगे
मन तो मन जनाब
उनके तन भी
इन वृक्षों पर
अमरबेल बनके लिपट जायेंगे
फिर भी पूर्ण नहीं
होती ये किताब
अभी लिखने हैं
इसके बाकी भाग
इन वृक्षों पर शब्दरूपी
स्वादिष्ट फल आयेंगे
लोग फल खायेंगे
और शब्दों के बीज रोपे जाएंगे
बीज अंकुरित होंगे
नव—पल्लव आयेंगे
ये शब्दों के पौधे वृक्ष बनकर
एक और वन बन जायेंगे
लोग फिर आयेंगे
मन तो मन उनके तन
इन वृक्षों पर
फिरसे अमरबेल बनकर
लिपट जायेंगे
फिर भी पूर्ण नहीं होगी
मेरी ये किताब
क्यूँकि अभी आने हैं
न जाने इसके
कितने भाग—कितने भाग—कितने भाग
क्यूँकि ये किताब
मेरी ज़िन्दगी है
इसके शब्द मेरी साँसे हैं
मेरे तन की साँसे
जब बंद हो जायेंगी
तब इस किताब के शब्दों में
मैं हमेशा-हमेशा के लिए
विद्यमान हो जाऊँगा
वक़्त के साथ-साथ
मेरे शब्दों के ये जंगल
और घने हो जायेंगे
और अगर गलती से भी
गुजरे इनके बीच तुम
तो ये शब्द अमरबेल बनकर
तुमसे लिपट जायेंगे
और मैं पुनः
जी उठूँगा इन शब्दों के साथ
तुम्हारी साँसों में
तब लिखूँगा
एक और भाग—एक और भाग—एक और भाग
तब पुनः छपेगी
मेरी किताब
नया भाग—नया भाग—नया भाग
अब तो तुम भी दोगे
जरूर दाद
क्या बात—क्या बात—क्या बात

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8 वर्ष पहले

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