आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ऐ मेरे बचपन

                
                                                         
                            ऐ मेरे बचपन मुझे छोड़ कर जाते किधर हो
                                                                 
                            
उम्र बढ़ती जा रही गंभीरता भी आ गई है
लग रहा है जैसे अपरिचित कुछ घटाएं छा गई है
ले चलो ए मित्र मुझको तुम जहां जाते जिधर हो

है ना अब स्वागत चतुर्दिक ही मुझे फटकार मिलता
हो गया है लुप्त तुम जब थे मुझे जो प्यार मिलता
सब यही कहते कि कुंदन क्यों नहीं जाते सुधर हो
ऐ मेरे बचपन मुझे जब छोड़कर जाते किधर हो

है लड़कपन फिर जवानी तब बुढ़ापे की कथाएं
है कहीं खुशियां जन्म की मृत्यु की आतुर व्यथाएं
तुम रुदन के बीच लगता हंस रहे कोई अधर हो
ऐ मेरे बचपन मुझे अब छोड़ कर जाते किधर हो

अब मेरे मन में मनोरम याद तेरी रह गई है
लग रहा ज्यों एक गंगा आसुओं सी बह गई है
जिंदगी की प्रथम रेखा के इधर में तुम उधर हो
ऐ मेरे बचपन मुझे अब छोड़ कर जाते किधर हो

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर