ऐ मेरे बचपन मुझे छोड़ कर जाते किधर हो
उम्र बढ़ती जा रही गंभीरता भी आ गई है
लग रहा है जैसे अपरिचित कुछ घटाएं छा गई है
ले चलो ए मित्र मुझको तुम जहां जाते जिधर हो
है ना अब स्वागत चतुर्दिक ही मुझे फटकार मिलता
हो गया है लुप्त तुम जब थे मुझे जो प्यार मिलता
सब यही कहते कि कुंदन क्यों नहीं जाते सुधर हो
ऐ मेरे बचपन मुझे जब छोड़कर जाते किधर हो
है लड़कपन फिर जवानी तब बुढ़ापे की कथाएं
है कहीं खुशियां जन्म की मृत्यु की आतुर व्यथाएं
तुम रुदन के बीच लगता हंस रहे कोई अधर हो
ऐ मेरे बचपन मुझे अब छोड़ कर जाते किधर हो
अब मेरे मन में मनोरम याद तेरी रह गई है
लग रहा ज्यों एक गंगा आसुओं सी बह गई है
जिंदगी की प्रथम रेखा के इधर में तुम उधर हो
ऐ मेरे बचपन मुझे अब छोड़ कर जाते किधर हो
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