गुनगुनाती रही नदिया
निकल पहाड़ों से।
लरजति ,लहरती,
इठलाती,इतराती,
मैदानों तक।
कभी रुद्र,तो कभी चंचल,
कभी शांत,कभी हलचल,
हर परिवेश में खुद को ढालती
बहती रही अनवरत
बिना थके ,बिना रुके।
बस,रौ में अपने एक गीत गाते हुए,
गुनगुनाते हुए।
खुद को ही समझते और समझाते हुए।
कि प्यार सिर्फ समुद्र से मिलन नहीं।
ये तो जीवन का सफ़र है।
गुनगुनाते,मुस्कुराते, हंसते, हँसाते
पूरा करना है क्योंकि एक न एक दिन
सबको मिटना है।
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