क़र्ज़
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माँ का मुझ पर कर्ज बहुत था
बस इसका ही दर्द बहुत था
दुख मुझको कभी देख न पाया
जब तक सर था उनका साया
मुझको सदा छुपाकर रखा
माँ आँचल का अर्ज बहुत था
मुझ पर माँ का कर्ज बहुत था
बस इसका ही दर्द बहुत था
याद मुझे है सारी बातें
वो सर्दी की निष्ठुर रातें
माँ ख़ुद में ही ठिठुरी जाती
पर मुझ को वो खूब उढ़ाती
मुझको हरदम ख़ुश रखने को
वी अपना सर्वस्व लुटाती
मैं मूर्ख, नादान , अभागा
समझ न पाया त्याग का धागा
मैं अपनी हर ज़िद मनवाता
मन मेरा खुदगर्ज बहुत था
माँ का मुझ ओर क़र्ज़ बहुत था
बस इसका ही दर्द बहुत बहुत था
- कुमार सर्वेश
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