टक-टकी लगाये देख रहा था,
उम्मीदों को पाल रहा था ।
जो खोता ही आया बेटी को,
वो पाने का बेटी से सोच रहा था ।
सोच-विचार, कर्म-कर्तव्यों के,पैमाने,
फिर से गढ़ने की सोच रहा था ।
मोह छोड़ बेटे का,
बिटिया से आशा बाधं रहा था ।
यत्र-तत्र,
हे नारी तू सर्वत्र विजयी है।
पुरुषों ने खायी मुंह की,
तू अपने-आप खड़ी है ।
मिथक तोड़ दुनिया के,
तूने खुद को पहचाना।
- कुलदीप यादव
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