सुकून नहीं मिलता बाहर,
अन्तरात्मा में ढूंढने में,
जीवन निकल जाता है।
खुशी पैसे से मिल सकती है,
सुख नसीब से आता है,
यह सब क्षणिक होते हैं,
एक आवश्यकता पूरी हुई,
तब दूसरी जरुरत पर ,
मन मचलने लगता है।
सुकून प्रारब्ध से मिलता है,
शान्ति की चाहत में,
जीवन निकल जाता है,
जरुरी नहीं कि शान्ति,
सुकून मिल ही जाए।
सुकून अध्यात्म से जुड़ा है,
सुकून सूफियाना अंदाज है,
सुकून संत मत की पहचान है,
सुकून आडम्बरों से निकलकर,
आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत है।
आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत है।
-कुलदीप शुक्ला
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