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टुकड़े टुकड़े चांद

                
                                                         
                            टुकड़े टुकड़े चांद
                                                                 
                            
धन्य हो तुम ए आसमां के चांद,
पूर्णमासी को बिखेरते हो तुम....
टुकड़े टुकड़े चांदनी,
टुकड़े टुकड़े बिखर कर,
अमावस्या को लुप्त हो जाते हो चांद,
फिर से नवजीवन लेकर,
रात की कालिमा कम करने को,
कर लेते हो अपने को तैयार,
अनादि काल से यही सिलसिला,
क्या थकते नहीं कभी तुम चांद?,
शायरों की तो बात न पूछो,
कभी महबूब कभी महबूबा,
इन्होंने तुम्हे बनाया है,
कवियों ने भी कर कर तुलना,
कभी उपमा कभी उपमेय,
न जाने क्या क्या बताया है,
मां का बन के भाई बच्चों के तुम मामा हो,
करवा चौथ पर बन जाते हो,
तुम सुहाग की निशानी चांद.
कुल भूषण ©️®️
02.03.23
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3 वर्ष पहले

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