आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नम आवाज

                
                                                         
                            नम आवाज
                                                                 
                            
याद है, जब भी मैं कहता था,
सुनो - तुमनें कुछ कहा क्या,
तुम कहती थी - नहीं तो,
तो मैं कहता था - तो कहो न,
तुम्हारी मीठी मधुर आवाज सुनने को कान तरस गए हैं,
अब जब भी अकेला होता हूँ,
तुमसे बातें करता हूँ,
और कोशिश करता हूँ,
खामोशी से,
तुम्हारी आवाज़ सुनने की,
अचानक कहीं दूर से आती हुई,
मधुर सी, मीठी सी,
नम सी एक आवाज़,
कानो से मद्धिम सी टकराती है,
ये तुम्हारी ही आवाज़ होती है,
जाते जाते भी तुम्हारे मुख से,
ऐसी ही मद्धिम सी आवाज निकली थी,
मुझे बचा लो, मुझे बचा लो,
मैं बदहवास इधर उधर कोशिश करता हूँ,
मगर प्रकृति के क्रूर हाथों ने,
हमें सदा के वास्ते,
जुदा कर दिया.

- कुल भूषण
10.04.21
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर