लम्हा लम्हा ये मुहब्बत सताने लगी है,
सुकून की नींद जो अक्सर आती थी,
वो भी अब रंग दिखाने लगी है,
आंखों में बन लाल डोरे,
लम्हा लम्हा डराने लगी है,
न जाने ये कैसा हसीन डर है,
इसकी पीड़ा भी दिल को बहलाने लगी है,
आंधी हो या तूफान,
सर्दी, गर्मी या बरसात,
मौसम की हर चाल,
लम्हा लम्हा मुझे भाने लगी है,
मगर इस दिल का क्या करूं,
जहां मिलन की छाप का रंग,
पूरे बदन पे नजर आता है,
और मुझे हर लम्हा तेरी याद सताने लगी है.
-कुल भूषण
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