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रंग–ए–बहार में तो जमीं गुल-ए-गुलजार है,
मगर मुझे बहार-ए-बे-ख़िज़ाँ की दरकार है,
हाथों के फूल मुरझा न जाएं,
दिलबर मुझे तुम्हारा ही इंतजार है.
कुल भूषण ©️®️
30.03.23
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3 वर्ष पहले

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