इन ऑखो के झरोखो मे एक कोयल कूक रही थी।
हम खोये थे तेरे सपनों में वो कह रही थी सुबह हुई।।
फिर चला सर्द हवा का झोंका छूने लगा मेरे दिल को।
जैसे तुम छू लेती थी अपने हाथों से क़भी कभी ।।
फिर दौड़ती हुई गिलहरी रुकी देखने लगी अचरज से मुझको।
जैसे देखा करती थी रुक रुक कर पहले मुझको ।।
फिर गिरे डाल से दो पत्ते एक फुल के साथ मे ।
लग रहा था गिर चुके हम हल्के हल्के तेरे प्यार में ।।
फिर चिड़िया चहकी गा रही थी मिट्ठा मीठा मधुर गान ।
जैसे बज रही हो तेरी परों की पायल ओर चूड़ियों की खन खन ।।
फिर ओश की बूंदो की मेरे चेहरे पे बौछार हुई ।
एक नई सुबह और तेरी याद में इस दिन की शुरूवात हुई
केके यादव
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X