वो आए और हम ठहर गए,
दोनों की यूँ मुलाक़ात हुई।
मधुशाला तो बहुत दूर थी,
उन्हें देखा तो नज़र ही मदहोश हुई।
बातों का सिलसिला यूँ चला,
कि दिल और दिमाग़ दोनों साथ चले।
उनसे मिलकर एहसास हुआ,
जैसे दो रूहें बरसों से एक-दूसरे की परछाई हों।
उन्होंने हमें एक छोटा-सा तोहफ़ा दिया,
और हम उन पर अपना दिल हार बैठे।
ज़ालिम... आज की रात भी कैसी है—
पूर्णिमा का चाँद है,
मगर उसकी चाँदनी से ज़्यादा
उनकी मुस्कान दिल में उतर बैठी।
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