जब-जब कमरे में तेरी यादों का पहरा था,
जब-जब तेरी बाँहों में मेरे सुकून का बसेरा था,
जब-जब तेरा कुछ न कहना भी समझ आ जाता था,
तेरी ख़ामोशी में भी मेरा दिल मुस्कुरा जाता था।
जब-जब तेरी आँखों में
मैंने अपना अक्स देखा था,
जब-जब तेरे करीब होकर
खुद को सबसे महफ़ूज़ देखा था।
तब कहाँ पता था
कि ये पल यूँ गुज़र जाएँगे,
तेरी बाँहों के वो घेरे
एक दिन याद बन जाएँगे।
आज भी उस कमरे में
तेरी आहट-सी लगती है,
ख़ामोश दीवारों पर
तेरी बातें ठहरी-सी लगती हैं।
मैं आज भी वहीं हूँ—
उसी जगह, उसी एहसास में,
जहाँ तू था…
और मैं थी
तेरे होने की आस में।
बस फ़र्क इतना है—
तब तेरी ख़ामोशी समझ आती थी,
और आज…
तेरी ख़ामोशी ही समझ नहीं आती।
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