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ग़म का समंदर

                
                                                         
                            कुछ आंसुओं के कतरे हैं कुछ अपनों के ग़म
                                                                 
                            
कुछ जिंदगी के दर्द है जो है बेरहम
यूं तो मामूली शख्सियत है अपनी
मिज़ाज -ए -फकीराना हम
ये दिल है कि ग़म का समंदर है
जिसमें डूब के भी मुस्कुराते हैं हम
उम्र भले कम हो मगर उम्र से बड़े ग़म
ज़िंदगी सीधे मुंह बात ना करे तो क्या करें हम
आसान नहीं था सफर जो हमने तय किया
राहे मुश्किल थी पगडंडियों पे चले हम
जब-जब ठोकर खाई एक-एक सबक मिला
गिरे नहीं संभलते संभलते चले हम
हम जितने सीधे रहे उतने धोखे खाए
उस पर भी सबको माफ़ करते चले हम
सीने में दिल है या पत्थर है "किशन"
जो टूट के भी टूटता नहीं तेरा "दम"

 
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एक घंटा पहले

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