घिर आये पयोद घनेरे
छिप गया शशि यूँ मुख फेरे
ज्योत्सना भी रुठी सी यहाँ
ना दिखलाये मेरा चाँद कहाँ?
सज सँवर के करती प्रतीक्षा
प्यासे हिय में जागी लिप्सा
हर सितारा ढूंढता रहा
ना दिखलाये मेरा चाँद कहाँ ?
कड़क रही यूँ तीव्र दामिनी
मंद पवन संग महकी कामिनी
शशि संग छिप बैठी तू विभा
ना दिखलाये मेरा चाँद कहाँ?
नभ का आँगन दिखता सूना
विधु ना तारों का बिछौना
प्रश्न करती तारों की लड़ियाँ
ना दिखलाये मेरा चाँद कहाँ ?
तारों का लगता मेला था
विधु तो फिर भी अकेला था
छिप गया गहन तिमिर में यूँ
ना दिखलाये मेरा चाँद कहाँ ?
जल रही ये सैकड़ों दीप्तियाँ
रोशन हुई कितनी बस्तियाँ
रूठा विधु खोया जाने कहाँ ?
ना दिखलाये मेरा चाँद कहाँ ?
-कविता चौहान"
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