कुछ कहानियांँ ऐसे खत्म हुई
सब तालियांँ बजाना भूल गए
ख़ामोश थे दर्शक सारे
अल्फ़ाज़ आंँखों से बह गए
ये किरदार नहीं पल दो पल का
उम्र भर की कमाई है
ये सारा खेल जिस्मो का
रूह से कैसी जुदाई है?
इस जीवन के रंग-मंच पर
यूंँ ही किरदार बदलते रहते हैं
जिसके अभिनय में हो दम
वही अमर गाथाएं लिखते हैं
-कविता श्री
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