अधर काँपते हैं, नयन पूछते हैं
कि अब और कितना, सितम हम सहेंगे
सुहानी वो रातें, वो मीठी सी बातें
हृदय में चुभी हैं, किसी शूल जैसी
खिले थे जो अरमान, इस दिल के आंगन
हुई उनकी रंगत, उड़न धूल जैसी
इसी कश्मकश में, व्यथित मन मेरा है
जुदाई के दरिया में, कैसे बहेंगे
अधर काँपते हैं, नयन पूछते हैं
कि अब और कितना, सितम हम सहेंगे
लकीरें हथेली पे, जो बन गई थीं
उन्हें आंसुओं से, मिटाने लगा हूँ
तेरी याद में जो, बनाए थे महल
मैं खुद अपने हाथों, गिराने लगा हूँ
जला कर के अपने, मुकद्दर का पन्ना
भला ज़ख्म दुनिया से, क्या हम कहेंगे
अधर काँपते हैं, नयन पूछते हैं
कि अब और कितना, सितम हम सहेंगे
नदी को समंदर की, बाहों में जाना
यही रीत सदियों से, जग में रही है
पतंगा भी जलता है, दीपक की लौ पर
ये गाथा विरह की, हवाओं ने कही है
लिखा है जो किस्मत में, बिछड़ना हमारा
तो फिर किस लिए पास, आते रहेंगे
अधर काँपते हैं, नयन पूछते हैं
कि अब और कितना, सितम हम सहेंगे
गिरे ओस के कण, जो पत्तों के ऊपर
किरण छू गई तो, वो मोती बने हैं
कटे संग तराशों के, हाथों से पत्थर
तभी तो छैनी सह के, वो मूरत बने हैं
बिना टूट बिखरे, ऐ मेरे हृदय मन
भला हम कहां तक, मुकम्मल बनेंगे
अधर काँपते हैं, नयन पूछते हैं
कि अब और कितना, सितम हम सहेंगे
-भानु शर्मा रंज
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