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कहो किस तरह मैं ये बेला गुज़ारूँ

                
                                                         
                            स्मृतियाँ सुलगतीं पिघलता समय है
                                                                 
                            
हृदय में बसा बस तुम्हारा प्रणय है
तुम्हें पास मानूँ कि दूरी निहारूँ
कहो किस तरह मैं ये बेला गुज़ारूँ

नयन सीपियों में सहेजे थे मोती
मगर आज पलकें उन्हें बैठ रोतीं
अधूरी कथा का मैं पन्ना पुराना
कि जिसने न सीखा कभी मुस्कुराना
इसे अब सँवारूँ कि ऐसे ही वारूँ
कहो किस तरह मैं ये बेला गुज़ारूँ

अनादि व्यथा का सजल काव्य हूँ मैं
स्वयं आहुति हूँ स्वयं हव्य हूँ मैं
जली राख का ही बचा भस्म कण हूँ
पराजित हुआ जो मैं वो मूक रण हूँ
स्वयं को जिताऊँ कि बाज़ी मैं हारूँ
कहो किस तरह मैं ये बेला गुज़ारूँ

तुम्हारे बिना सूनी हर एक दिशा है
सवेरा भी लगता भयानक निशा है
कि जब प्राण वीणा के सब तार टूटे
तो फिर स्वर भी कैसे सुरों संग फूटे
नए सुर मिलाऊँ कि वीणा बिसारूँ
कहो किस तरह मैं ये बेला गुज़ारूँ

न पथ का ही बोध न मंज़िल की सुध है
मेरे ही विरुद्ध मेरा ये युद्ध है
थकी नाव मेरी थका सा किनारा
न अम्बर का संबल न जल का सहारा
भँवर में समाऊँ कि खुद को उबारूँ
कहो किस तरह मैं ये बेला गुज़ारूँ
स्मृतियाँ सुलगतीं पिघलता समय है
हृदय में बसा बस तुम्हारा प्रणय है
-भानु शर्मा रंज
 
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एक घंटा पहले

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