कुछ दिनों के लिए आते हैं लोग मेरी ज़िंदगी में,
और मैं उन्हें अपना पूरा जहाँ मान लेता हूँ।
पलकों पे बिठाता हूँ उन्हें इतनी शिद्दत से,
कि हर मुलाक़ात को आख़िरी समझ कर जी लेता हूँ।
पर न जाने कैसा यह दस्तूर है मेरे वक़्त का,
जो भी पसंद आए, वो जल्द ही दूर चला जाता है।
कुछ ही क़दम साथ चलते हैं मुस्कुरा कर,
फिर बिना वजह, वो रास्ता बदल जाता है।
क्या मेरे जज़बातों का वज़न ज़्यादा होता है,
या मेरा बेहद चाहना उन्हें भारी लगता है?
जिस रिश्ते को सँवारने की कोशिश करता हूँ,
वही धागा छूट जाता है।
हर बार यह दिल एक ही सवाल पूछता है,
क्या कमी रह गई मेरे उस प्यारे से साथ में?
वो तो निकल जाते हैं अपनी राहों पर आगे,
और मैं रह जाता हूँ वहीं खाली हाथ में।
फिर भी यह दिल एक उम्मीद का दीपक जलाए रखता है,
कि कोई तो आएगा जो ठहरना जानता होगा।
जो सिर्फ़ आने और जाने की जल्दी में नहीं होगा,
बल्कि मेरे साथ हर मौसम गुज़ारना जानता होगा
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