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मैं अपनी भाग्यविधाता हूं ।।

                
                                                         
                            ना श्रेता की सीता हूं ना द्वापर की राधा हूं,
                                                                 
                            
मैं कलियुग में जन्मी हूं, मैं अपनी भाग्यविधाता हूं।।
ना अग्निपरीक्षा मेरी पहचान , ना विरह मेरी कहानी हैं,
मेरी ख़ामोशी कमजोरी नहीं , मेरी अपनी एक रवानी है।।
मैं परंपरा का मान भी हूं
और बदलाव की आवाज भी।
मैं शांत समंदर की लहरों -सी
और हूं एक सैलाब भी।।
नतमस्तक भी हो जाती और करने का भी दम रखती हूं,
मैं रानी लक्ष्मीबाई की पहचान और इंदिरा की परछाई हूं
मैं परिवर्तन की नई लहर रग रग में समाने आई हूं,
मैं स्वयं से लिखीं गई स्वयं की ही गाथा हूं;
मैं कलियुग में जन्मी हूं
मैं अपनी भाग्यविधाता हूं ।।
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56 मिनट पहले

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