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ख़्वाब-ए-अब्रेशम और आख़िरी नींद

                
                                                         
                            ख़्वाब-ए-अब्रेशम और आख़िरी नींद (रेशमी ख़्वाब और अंतिम नींद)
                                                                 
                            

हाथ मौत के आगे मैं क्यों जोड़ूँ,
नींद रुक-रुक ही सही, आती तो है।

सफ़र-ए-ज़िंदगी की थकान से कह दो,
शिकायत की अब कोई गुंजाइश नहीं,
यह धड़कन ठहरने का सामाँ सही,
कम से कम चैन की साँस लाती तो है।
हाथ मौत के आगे मैं क्यों जोड़ूँ...

ये माना कि शामें उदास ही रहीं,
तन्हाइयों ने दिल को घेरे रखा,
पर उस आख़िरी हिचकी का शुक्र करूँ,
जो हर एक दर्द से मुक्ति दिलाती तो है।
हाथ मौत के आगे मैं क्यों जोड़ूँ...

मख़मली अंधेरा जो फैला चहुँ ओर,
इसे ख़ौफ़ का नाम क्यों दें भला,
ये वो चादर है जो बिन माँगे मिली,
जो ज़माने की बेरुख़ी छुपाती तो है।
हाथ मौत के आगे मैं क्यों जोड़ूँ...

बिंदास जिए, बिंदास ही जाएँगे,
कफ़न का भी अपना एक रुतबा होगा,
महफ़िल न सही, तन्हाई का मुक़द्दर सही,
यह मौत गले से लगाती तो है।
हाथ मौत के आगे मैं क्यों जोड़ूँ,

नींद रुक-रुक ही सही, आती तो है।
-कपिल देव जुल्का
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 घंटे पहले

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