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तुम क्या जानो मुझ पर क्या क्या गुज़री है

                
                                                         
                            तुमने तो बस तन्हा चलना छोड़ दिया,
                                                                 
                            
मेरा हौंसला आधे राह में तोड़ दिया।

तुम क्या जानो मुझ पर क्या-क्या गुज़री है,
तुमने तो बस बातें करना छोड़ दिया

जिन हाथों को थाम के चलना सीखा था,
उन हाथों ने गहरे दरिया में छोड़ दिया।"

ज़िंदा हूँ पर साँसें बोझ सी लगती हैं,
जीते जी ही तूने हमको तोड़ दिया।

मेरे इश्क़ का धागा कच्चा था शायद
झटके में तूने हर रिश्ता तोड़ दिया।

शहर-ए-वफ़ा में मेरा अब क्या ठिकाना यार,
जब तूने ही मेरा दामन छोड़ दिया।
-कन्नु सैनी
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31 मिनट पहले

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