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शिकस्त-ए-सुकून

                
                                                         
                            आया था हजारों खुशियां लेकर मैं,
                                                                 
                            
मां की झोली में एक नया रंग लेकर,
पिता का साया और उम्मीद बनकर,
चारों ओर खुशियों की बौछार बनकर।

बचपन की ढाल, और मां का अनमोल प्यार बनकर,
बीत गया खेलते-खेलते वो सारा बचपन,
दोस्तों की टोली, कागज की कश्ती और मौली बनकर,
मिट्टी की खुशबू और बेफिक्री का संसार बनकर।

जब आया उस मासूम बचपन से निकलकर,
कंधों पर अपनों की उम्मीद और भविष्य की तलाश लेकर,
देखा तो जिंदगी का रास्ता कुछ अलग था,
मैं चल पड़ा हौसलों की मशाल लेकर।

सुलगती रही रातों की नींद, सुकून कहीं खो गया,
मैंने खुद को तपाया, संघर्ष की आग जलाकर,
कांटों भरी राहों पर भी मुस्कुराना सीख लिया,
एक बेहतर भविष्य और थोड़ी संपत्ति जुटाकर।

मगर इस दौड़ में जब भी पीछे मुड़कर देखता हूँ,
वो माँ का आँचल, वो पिता की डांट याद आती है,
सफलता की इस ऊँची इमारत की हर एक ईंट में,
मुझे अपने परिवार की ही दुआ नजर आती है।

अब संपत्ति तो है, पर वो बचपन का सुकून ढूंढता हूँ,
पैसों की खनक में दोस्तों की वो गूँज ढूंढता हूँ,
बड़ा तो हो गया हूँ दुनिया की नजरों में मगर,
आज भी खुद में माँ का वो छोटा सा 'मिश्री का दाना' ढूंढता हूँ।

 
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एक घंटा पहले

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