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कांच सा रिश्ता ,पत्थर सा दोस्त

                
                                                         
                            क्या गिनाऊं तेरे गुनाहों को,
                                                                 
                            
मजबूर था मैं तेरे हर सितम से।
बयां नहीं कर सकता मेरी दास्तां,
वार पड़ रहा था हर जी फीका,
मेरी खामियों को देखकर।
चुप रहा कि शायद तुम बदलोगे कभी,
पर तुमने तो मेरी खामोशी को ही मेरी कमजोरी मान लिया।
मैंने तो कांच की तरह संभाला था इस रिश्ते को,
पर तुमने उसे सरेबाजार पत्थर मारकर तोड़ दिया।
जिसे भाई से बढ़कर माना था मैंने,
उसने ही पीठ पीछे खंजर का वार किया।
महफिलों में जो मेरी ढाल बनकर रहता था,
आज उसी दोस्त ने सरेआम मुझे शर्मसार किया।
गैरों की क्या औकात थी जो मुझे रुला पाते,
पर तुम्हारी दी हुई इस दगा ने मुझे अंदर से तोड़ दिया।
अब और नहीं बची गुंजाइश इस दोस्ती की,
कि खुद को खोकर तुम्हें पाने की चाहत अब खत्म हुई।
हिसाब क्या करें अब तुम्हारी इन बेवफ़ाइयों का,
जब मेरी सच्ची यारी ही तुम्हारी नजरों में बेअसर हुई।
जाओ, मुबारक हो तुम्हें नए मतलबी यार तुम्हारे,
हमने भी आज से तुम्हारी यादों का रुख मोड़ दिया।
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3 घंटे पहले

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