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"ज़मीर का आईना"

                
                                                         
                            हालात न भूलूँ, जज़्बात न भूलूँ,
                                                                 
                            
मैं अपने अंदर के गहरे वो राज़ न भूलूँ।
खामोशियों से जो आज ये गरमाई छाई है,
इस सन्नाटे में सुलगती, अपनी आवाज़ न भूलूँ।

चाहे छू लूँ बुलंदियां मैं इस आसमान की,
पर जमीं से जुड़ा, अपना परवाज़ न भूलूँ।
वो जो कल थे मुसाफिर, आज जो रहबर बने हैं,
सफर की गर्द का, वो पहला आगाज़ न भूलूँ,

मिले जो शौहरत मुझे इस ज़माने से कभी,
तो अपनों की आँखों का, वो साज़ न भूलूँ।
जो वक़्त के थपेड़ों ने दिए थे ज़ख्म गहरे,
उन ज़ख्मों से सीखा, जीने का अंदाज़ न भूलूँ।
कई आएँगे दुनिया में मुसाफ़िर बनकर यहाँ,
पर जो दिल से जुड़े, वो हमराज़ न भूलूँ
बिका करते हैं ईमान यहाँ चंद सिक्कों में,
मैं खुद को बचाए रखूं, वो पाकीज़ा नाज़ न भूलूँ।

धूप जो झेली है मैंने, कड़े इम्तिहानों की,
सुकून की छाँव में, वो काली रात न भूलूँ।
टूट कर भी जो सीधे खड़े रहना सिखाती है,
खुद में छिपी, उस खुद्दारी का हाथ न भूलूँ।
जो हँसते थे मुझपर मेरे बुरे दौर में कभी,
उनकी बदौलत बदली, अपनी औकात न भूलूँ।
जिन्हें गुरूर था अपनी ऊंची उड़ानों पर बहुत,
उनके आगे झुका नहीं, वो अपनी ज़ात न भूलूँ।

दुनिया बदलेगी रंग, कई चेहरों के पीछे,
पर मैं अपने उसूलों का, अंदाज़ न भूलूँ।
मंज़िलें चाहे जितनी भी आसान हो जाएँ,
मुश्किलों से लड़ी, अपनी हर मात न भूलूँ!
हालात न भूलूँ... जज़्बात न भूलूँ...
 
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37 मिनट पहले

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