ये बात मुझकों पता नहीं थी ख़त-ए-मुक़द्दर में वो नहीं थी
बदन तो उसका था पास मेरे मगर हाँ पैकर में वो नहीं थी
मैं जब भी आँखों को बंद करता हर एक जानिब वही थी दिखती
मगर इन आँखों को जब भी खोला किसी भी मंज़र में वो नहीं थी
कमान-ए-अबरू निगाह-ए-खंज़र तमाम फ़ित्ने थे उसके अंदर
अकेली फ़ौजी रही हमेशा किसी के लश्कर में वो नहीं थी
नसीब में थी बहुत सी दौलत बड़ा सा बंगला अज़ीम शोहरत
हर एक शय थी मुझे मयस्सर मगर मयस्सर में वो नहीं थी
-जॉनी अहमद क़ैस
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X