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थोड़ी आँखें हैं नम

                
                                                         
                            शब्द हैं थोड़े थोड़ी आँखें हैं नम
                                                                 
                            
यूँ दिखते नहीं हैं मेरे जख्म,
जाकर के लौटे हैं कितने ही शख्स
क्यूँ फिर इतनों को होते हैं दिन में भरम।
सर्दी की रातें भी लगती हैं छोटी
जब रुकते नहीं गिरते पलकों से मोती,
बारिश का बूँदें भी लगती गरम
जब सूरज है ठण्डा और चाँद है गरम।
शब्द हैं थोड़े थोड़ी आँखें हैं नम
यूँ दिखते नहीं हैं मेरे जख्म,
जाकर के लौटे हैं कितने ही शख्स
क्यूँ फिर इतनों को होते हैं दिन में भरम।
मंजिल थी दूर पर लौटा नहीं था
जहाँ कोहरा घना था मैं चलता वहीं था,
आज मंजिल है पास और कोहरा नहीं है
पर टूटा हूँ ऐसे जैसे संयम नहीं है;
राह है सीधी थोड़े काँटे हैं कम
घाव पे दिखती है मरहम नरम।
शब्द हैं थोड़े थोड़ी आँखें हैं नम
यूँ दिखते नहीं हैं मेरे जख्म,
जाकर के लौटे हैं कितने ही शख्स
क्यूँ फिर इतनों को होते हैं दिन में भरम।
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2 घंटे पहले

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