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रात अकेले ही खड़ी है

                
                                                         
                            थोड़ी गुमशुम है थोड़ी हैरां है
                                                                 
                            
शायद मिली नहीं है चन्दा से,
धुन में अपनी हुंकार भरी है
रात अकेले ही खड़ी है ।
होश नहीं है चन्दा को
वो खेल रहा घटाओं से,
कभी छिप जाता है घंटों तक
कभी बतियाता हवाओं से ।
भौं चढ़ा ली रात ने अपनी
बात ये चन्दा तक पहुंची है,
अब फूल सफेद चन्दा है लाया
देख उसे दिल वार पड़ी है
रात अकेले ही खड़ी है ।
बरसाते अधजल बादल हैं
गुर्राते हर पल बादल हैं,
गरजते हैं इतराने को
जल कितना ये दिखाने को ।
एक घटा बादल से लड़ी है
हाथ लिए अधजल खड़ी है,
कभी डर जाती है गरज से यूँ ही
कभी गले रात के आ पड़ी है;
रो रही टपकाए आँसू
अपने बात कहने को अडी है
रात अकेले ही खड़ी है ।
हवा को देखा मस्ती में
वो नाच रही थी तेज धूप में,
साँझ होने से पहले ही
जैसे नशा किये वो लेटी है;
कभी ले आती है झोंके पल में
कभी घंटों तक वो रोती है ।
देर रात तक डूबी गम में
होश आने पे आँख लड़ी है,
रात अकेले ही खड़ी है ।
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37 minutes ago

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