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मेरे घर के आँगन में

                
                                                         
                            मेरे घर के आँगन में दूर कहीं से
                                                                 
                            
चलकर बिखरा पड़ा था,
शायद टूटा था किसी टहनी से
पर दिखने में मगरूर बड़ा था।
कुछ पल को बस दे दिया उसे अपना आँगन
कुछ पल बात अकेले में किया,
पर नहीं रुका उसकी अँखियों से वो गिरता सावन
मैं मुस्काया वो मुस्काया;
अब नहीं रहावो सिर्फ पत्ता
अब आँगन भी उसके गले पड़ा था।
मेरे घर के आँगन में दूर कहींसे
चलकर बिखरा पड़ा था,
शायद टूटा था किसी टहनी से
पर दिखने में मगरूर बड़ा था।
मेरे सीने से वो लिपट गया
जैसे जीना चाहता था वो,
अपनों से वो मुकर गया
जैसे धोखा खाया था वो।
देख उसे अब लगता था
वो सिकुड़ रहा है दिन हर दिन,
ना रहे जड़ तना और टहनियाँ
वो अस्तित्व खो रहा दिन हर दिन।
मैं कोशिश हर दिन करता था
हरा भरा उसे कर जाऊं,
वो संघर्ष कर रहा हर क्षण में
जैसे आखिरी साँस तक लड़ा पडा था।
मेरे घर के आँगन में दूर कहीं से
चलकर बिखरा पड़ा था,
शायद टूटा था किसी टहनी से
पर दिखने में मगरूर बड़ा था।
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एक घंटा पहले

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