भू तल में भूकम्प उठा
हवा नीर सब बोल उठा,
गगन समेटे अपना कम्बल
इक पैर नचा वो सघन जंगल ।
भाग खड़े कुछ जन बेचारे
जब पेड़ हरे किच्चारी मारे,
जीव जन्तु सब काँप उठे
संग वसुधा के नाच उठे ।
बयार सोयी है चादर ताने
विटप हिलोरें मारे हैं,
खग घोंसले हैं हिलते
खग अण्डों को सँवारे हैं ।
कोई मदद को चीख उठा
कई जीवन नए उजाड़े हैं,
आसमाँ तमाशा देख रहा
उसके झूठे तेवर न्यारे हैं ।
इमारत काँपतीं थर थर हैं
सब डरे छिपे बंजारे हैं,
कुछ क्षण में शमा बदल गया
कहीं दिखे नहीं हत्यारे हैं ।
जो बोल सका वो बोल उठा
हम प्रकृति अधीन तुम्हारे हैं,
चेतावनी से ना समझ सके
भोगी हम बेचारे हैं ।
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