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अपने उस पुश्तैनी घर की प्रीत को ।।

                
                                                         
                            खुले आसमाँ के नीचे
                                                                 
                            
वो सुंदर पुश्तैनी घर की रीत,
छत पर सोते,
ज़मीन पर खेलते l
हर एक के मन में थी प्रीत ॥

पुश्तैनी घर छोड़ा
और खरीदा फ्लैट,
आसमाँ में
तीसरी मंजिल का मकान,
समझा पा ली है समकालीन दुनिया,
और छू लिया ऊँचा आसमान॥

देखा जब ऊपर से
नीचे का नज़ारा,
तो पैरों के तले ज़मीं खिसक गई,
न खुला आसमाँ दिखा,
न मिला ज़मीं का किनारा,
बस दिखा ऊपर-नीचे
कंक्रीट की दुनिया ।

मेरी छत पर
चौमंजिले मकान ने
निगल लिया
खुले आसमान की रीत को,
फ्लैट के इन बंद
कमरों में ढूँढ़ता हूँ,
अपने उस पुश्तैनी घर की प्रीत को ।।
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2 घंटे पहले

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