विचारों के संघर्ष में क्यों रिश्ते मार जाते हैं ।
हम खुद जैसा ढूंढने में सबकुछ हार जाते हैं ।।
माना कि तुम्हें पसंद है झूठमहल में रहना
मगर सच्ची दीवारों से तुम्हें क्या है उलहना
जिनके खातिर सबकुछ करना था बेझिझक
उन्हीं से लड़ने में जीवन क्यों गुजार जाते हैं ।।
विचारों के संघर्ष में क्यों रिश्ते मार जाते हैं
हम खुद जैसा ढूंढने में सबकुछ हार जाते हैं।।
गम के साये से दूर रखने का किया था वादा
बांट खानी थी हर रोटी मिलकर आधा आधा
आज छिनने को उसका चैन-वैन और सकून
खुद का जीवन भी मुश्किलों में डार जाते हैं।।
विचारों के संघर्ष में क्यों रिश्ते मार जाते हैं
हम खुद जैसा ढूंढने में सबकुछ हार जाते हैं।।
किसे मिला है छिनने से सकून भला जग में
लालच बस दुःख के काँटे फैलाता है मग में
अर्पित मानवता को कर जीवन यात्रा अपनी
इस जग में विरलय ही प्रेम अपार पाते हैं ।।
विचारों के संघर्ष में क्यों रिश्ते मार जाते हैं
हम खुद जैसा ढूंढने में सबकुछ हार जाते हैं
-जयप्रकाश "जय बाबू"
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