तुम केवल परछाई नहीं स्वयं में एक उजाला हो,
इस अंधी आधुनिकता के कोलाहल में
अपने संस्कारों की ज्योति को मंद मत होने देना,
क्योंकि तुम्हारे अस्तित्व से ही
सभ्यता की आत्मा जीवित रहती है।
तुम चाहो तो
सूने आँगन को तीर्थ बना दो,
बिखरे हुए परिवार को
फिर से प्रेम का ग्रंथ बना दो।
तुम्हारे हाथों में
केवल चूल्हे की अग्नि नहीं जलती,
वहीं से संस्कारों का सूर्य उदित होता है।
दुर्गा हो —
तो अन्याय के विरुद्ध प्रलय बनो,
तुम काली हो —
तो अधर्म के अंधकार को भस्म करो,
तुम अन्नपूर्णा हो —
तो करुणा से संसार का हृदय भर दो,
तुम लक्ष्मी हो —
तो अपने तेज से हर घर में
समृद्धि का दीप जलाओ।
सावित्री हो —
तो नियति को भी चुनौती दो,
रानी लक्ष्मीबाई हो —
तो अन्याय के सामने झुको मत,
मीरा हो —
तो अपने सत्य के लिए जियो।
स्मरण रखना…
जब-जब स्त्री ने स्वयं को पहचाना है,
तब-तब इतिहास ने नया युग देखा है।
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