ये ज़ख्म भर जाएंगे एक दिन
दिन ही तो है गुजर जाएंगे एक दिन
मैं जो दुश्मन हूँ खुद अपनी खुदी का
आख़िर ठहर जाएंगे एक दिन
जो बिखरा बिखरा सा है हाल हमारा
शायद संवर जाएंगे एक दिन
वो जिनसे मिले कई दिन हो गए है
मिलके उन सबसे डर जाएंगे एक दिन
जिन ग़मो को समेट रखा है एक मुद्दत से
आखिर ये ग़म बिखर जाएंगे एक दिन
मौत का एक दिन मुअय्यन है नूर
वक़्त आया तो मर जाएंगे एक दिन
-नूर हसन
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