बारिश का पानी गिरता है ऐसे बादल से
गिरता है घुंघरू जैसे टूट कर माँ की आँचल से
उड़ती आती धरती पर ऊँचे दूर गगन से वो
लिपट कर आती हो जैसे सीतल-सीतल पवन में वो
गिर कर धरा पर अस्तितव उस की छीन-भिन्न हो जाती है
बरस जाये ज्यादा तो जीवन कठिन हो जाती है
तेरे इंतजार में किसानो के आँखे तरस जाती है
आवस्यकता न होती जहाँ, वह तू क्यों बरस जाती है
अब तू ही तू है हर जगह
कोई भी जगह बचा नहीं
घर में तू, गलियों में तू
खेत-खलियानो में भी समां गयी
ऊँचे पर था फिर भी, देख वो रेल फाटक डूब गया
क्यों बरसी तू ऐसे के केरल,कर्णाटक डूब गया
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