"तुम तो मेरे साथ ही हो"
यदि तुम्हें भुला दूँ तो कृतघ्नता होगी,
तुम्हें भूल जाना तो निर्ममता होगी।
तुम्हीं से तो मेरा जीवन खिला था,
तुम्हीं से तो मेरा वसंत खिला था।
न जाने कितने दिन भूखी रही साथ मेरे,
बिन गहने मनाए त्यौहार साथ मेरे।
औकात न थी जो तुम पर खर्च करूँ,
फिर भी न शिकन तुम माथे पर धरूँ।
तुमने मेरी बहनों को मान दिया पूरा,
अपने ही मान का ध्यान न दिया पूरा।
गुरबत में माँ-बापू की लाज रखी तुमने,
मेरे घर की हर एक साँस रखी तुमने।
तुम जैसा साथी पाया तो फिक्र कैसी,
फिर जीवन में कोई और जिक्र कैसी।
तुम थीं तो रातों में चैन रहा था,
तुम थीं तो दिन में सुकून रहा था।
तुमने ही तो मेरी मुस्कान रची थी,
मेरी थकान में भी आँच बची थी।
तुम सखी महान, हमसफर मेरी,
तेरे ही कंधे से नैया चली मेरी।
तुम मेरी धनवान सखी थीं,
मेरी हर पहचान सखी थीं।
सजल नयनों से आह भरी न कभी,
हर रिश्ते में तुम मुस्कान भरी सभी।
तुम मेरी पलकों की दिव्य परी थीं,
मेरे जीवन की कसौटी खरी थीं।
तुम पग-पग मेरे साथ चली थीं,
हर मोड़ पर हाथ में हाथ चली थीं।
इकतीस जनवरी सत्रह को परलोक गईं,
देह तज गईं, पर सत्कर्म यहीं छोड़ गईं।
मैं भुला न पाया, न भुला पाऊँगा,
बिन याद तुम्हें मैं जी न पाऊँगा।
आज भी लगता है तुम साथ ही हो,
मेरे हर निर्णय में, हर बात ही हो।
चुपके से जैसे मार्ग दिखाती हो,
गिरता हूँ तो आकर थाम जाती हो।
तुम गई नहीं, यहीं कहीं हो,
मेरी साँसों में, मेरी लय में ही हो।
हर जन्म में तुम्हीं से मिलना चाहूँ,
तुम्हें ही फिर से अपना बनाना चाहूँ।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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