"ठीक होना ही तकलीफ है"
तुम्हारे जाने पर दिल हिलोरें मार रोया,
लगा था कमी तुम्हारी, मुझे स्वाहा कर देगी।
समय बीता तो दिल, धीरे-धीरे संभला,
शरीर ने भी फिर से, साँसें भर ली।
ढाई बरस में सब, सामान्य हो गया,
सोचा था खिड़की पर, बैठा रहूँगा।
किसी काम में मन, कभी न लगेगा,
सुबह-शाम का अंतर, मिट सा रहेगा।
पर ऐसा कुछ भी, हुआ नहीं,
सुबह आई समय पर, शाम ढली वहीं।
रात गुजरी और फिर, सुबह हो गई,
दुनिया चलती रही, रुकी न कहीं।
पर मेरे भीतर कुछ, ठहर गया था,
जबकि बाहर सब, चल रहा था।
भूख लौट आई, नींद भी लौटी,
थकी आँखें रात में, फिर से सोई।
हँसी भी लौटी, बातें भी लौटीं,
महफिलों में फिर से, रातें भी लौटीं।
देखो न सखी, तुम्हारे बिना जी रहा हूँ,
टूटा हूँ पर, किसी को दिख नहीं रहा हूँ।
रोया भी हूँ, पर उतना नहीं,
जितना सोचा था, कभी कहीं।
मैं ठीक हूँ, सचमुच ठीक हूँ,
पर यही ठीक होना, सबसे कठिन है।
मन पूछता है, साँस कैसे चल रही,
तुम्हारे बिना भी, शाम ढल रही।
वो क्या था जो, तुम्हारे बिन डरता था,
तुम्हें भीतर तक, इतना भरता था?
शायद तुम्हारे साथ, मैं भी खो गया,
वो पुरुष जो गीतों में, तुम्हें ढूंढ़ता था।
छोटी बातों में भविष्य देखता था,
प्रेम पर जो, विश्वास रखता था।
कितनी शामें, इंतज़ार में बीतीं,
कितनी बातें, अनकही ही बीतीं।
सीना भारी हुआ, रोना चाहा,
आँखों ने भी, साथ न निभाया।
आँसू नहीं आए, खालीपन बढ़ा,
अजीब सा सूनापन, भीतर चढ़ा।
मेरे दुख में बारिश, हुई नहीं,
मेरी उदासी में धूप, रुकी नहीं।
दुनिया एक पल को भी, ठहरी नहीं,
मेरे अकेलेपन पर, ठहरी नहीं।
सब चलता रहा, मैं भी चला,
तुम्हारे साथ वो पुरुष, कहीं चला।
जो तुम्हारे होने से, दुनिया अपना कहता,
तेरे बिना अब, खुद को तनहा कहता।
ये चलता रहेगा, निर्वाण तक,
हमारा इसमें, कोई नियंत्रण नहीं।
ये सब उसी की, मर्जी से चल रहा,
उसी की मर्जी से, चलता रहेगा।
-- जगदीश प्रसाद शर्मा
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