"सृष्टि के प्रथम शिल्पी - भगवान विश्वकर्मा"
नमन तुम्हें हे आदि शिल्पी, हे विश्वकर्मा महान,
तुमने ही गढ़ा है सारा, ये सकल जहान।
वेद-पुराण कहते तुम्हें, सृष्टि का अभियंता,
तुम बिन अधूरी है सृष्टि, तुम ही तो निर्माता।।
सतयुग में तुमने रची, स्वर्ग की अमरावती,
देवों का निवास बनी, जो अनुपम, अति पावती।
जहाँ दुख न कोई, जहाँ आनंद ही धाम,
तुम्हारी कला से चमका, देवों का नाम।।
त्रेता में फिर तुमने, सोने की लंका बनाई,
रत्न-जटित, स्वर्ण-भरी, अनुपम कला दिखायी।
कुबेर की नगरी थी, फिर रावण ने पाई,
तुम्हारी शिल्प-कला की, गाथा जग में छाई।।
द्वापर में कृष्ण के लिए, द्वारका सजाई,
समुद्र तट पर अद्भुत, नगरी एक बसाई।
जो जल में भी अडिग रहे, ऐसी युक्ति लगाई,
इंजीनियरिंग तुम्हारी, देवों ने भी सराहि।।
फिर पांडवों के हित, इंद्रप्रस्थ सजाया,
मय-भवन जैसा दिव्य, महल वहाँ बनाया।
हस्तिनापुर भी तुम्हारा, ही तो है निर्माण,
तुम ही हो सृष्टि के, पहले विधान।।
तुमने ही गढ़ा पुष्पक, जो नभ में उड़ जाए,
मन की गति से चलता, जहाँ चाहे ले जाए।
कुबेर, रावण, राम ने, जिसका मान बढ़ाया,
तुम्हारा दिया विमान, इतिहास में छाया।।
देवों के रथ भी तुमने, दिव्य-भव्य बनाए,
जो अग्नि-पथ पर चलें, नभ में लहराए।
सुदर्शन चक्र विष्णु का, तुम्हारा ही निर्माण,
शिव का त्रिशूल, इंद्र का वज्र, तुम्हारी ही पहचान।।
जगन्नाथ की मूर्ति में, तुम्हारे हाथों का सार,
पुरी में आज भी बसता, तुम्हारा ही आकार।
चौंसठ कलाएँ, वास्तु-ज्ञान, तुमने जग को दिया,
मानव को शिल्प-कला का, पहला पाठ दिया।।
हे विश्व-विधाता, शिल्प के भगवान,
तुम हो सृजन के आदि, तुम ही हो महान।
तुम्हारी कृपा से ही, चलता है निर्माण,
तुमको नमन करे, ये सकल जहान।।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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