आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

संतोष का अमृत दे दो

                
                                                         
                            "संतोष का अमृत दे दो"
                                                                 
                            

हे ईश्वर, माया के आकर्षण,
खूब भोगे मैंने, सुख के आभूषण।
लगे थे मोती, निकली रेत है,
किरकिराते हैं अब, सुख की भेत है।

सुख क्या है, भ्रम टूट गया,
सपना जो देखा, सब छूट गया।
हे सुखप्रद, अब तो आ जाओ,
मेरे भीतर खुद को समा जाओ।

शांति उतार दो, भीतर मेरे,
सुख उतार दो, हो अंधेरे घेरे।
चैन उतार दो, मन के तल में,
संतोष का अमृत, भर दो पल में।

ना कष्ट रहे, ना क्लेश रहे,
ना लोभ रहे, ना क्षोभ रहे।
ना ईर्ष्या रहे, ना द्वेष रहे,
ना माया रहे, ना मोह रहे।

ना भोग रहे, ना रोग रहे,
ना तेरा रहे, ना मेरा रहे।
बस तेरी स्मृति, शेष रहे,
तेरी अनुभूति, अशेष रहे।

तेरा आँचल, मुझ पर हो,
तेरी गोद में, मेरा सर हो।
तेरी लोरी का, अनहद बाजे,
'यो वै भूमा', वही सुख साजे।

जहाँ भूमा है, वहीं सुख है,
बाकी सब तो, केवल दुख है।
हे ईश्वर, मुझको, अपना कर लो,
भूमा के सुख में, अब तो भर लो।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर