"संतोष का अमृत दे दो"
हे ईश्वर, माया के आकर्षण,
खूब भोगे मैंने, सुख के आभूषण।
लगे थे मोती, निकली रेत है,
किरकिराते हैं अब, सुख की भेत है।
सुख क्या है, भ्रम टूट गया,
सपना जो देखा, सब छूट गया।
हे सुखप्रद, अब तो आ जाओ,
मेरे भीतर खुद को समा जाओ।
शांति उतार दो, भीतर मेरे,
सुख उतार दो, हो अंधेरे घेरे।
चैन उतार दो, मन के तल में,
संतोष का अमृत, भर दो पल में।
ना कष्ट रहे, ना क्लेश रहे,
ना लोभ रहे, ना क्षोभ रहे।
ना ईर्ष्या रहे, ना द्वेष रहे,
ना माया रहे, ना मोह रहे।
ना भोग रहे, ना रोग रहे,
ना तेरा रहे, ना मेरा रहे।
बस तेरी स्मृति, शेष रहे,
तेरी अनुभूति, अशेष रहे।
तेरा आँचल, मुझ पर हो,
तेरी गोद में, मेरा सर हो।
तेरी लोरी का, अनहद बाजे,
'यो वै भूमा', वही सुख साजे।
जहाँ भूमा है, वहीं सुख है,
बाकी सब तो, केवल दुख है।
हे ईश्वर, मुझको, अपना कर लो,
भूमा के सुख में, अब तो भर लो।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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