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साथ का अर्थ कहाँ, साथ रहते समझ आता है

                
                                                         
                            पचास, पचपन, साठ पैंसठ वसंत जब बीत जाते हैं,
                                                                 
                            
दो पहियों से चलता रथ, तब तक गीत गाते हैं।
दुःख आधे लगते हैं, बोझ बँटा-सा लगता है,
साथी की साँसों से, घर बसा-सा लगता है।

साथ का अर्थ कहाँ, साथ रहते समझ आता है,
अर्थ तो उसका, साथ छूटने पर ही आँक पाता है।
दिन भर दफ्तर, घर की चिंता, मोल-भाव बाजार का,
साँझ ढले एक मुस्कान, हर लेती भार सार का।

एक थका-हारा पति, जब दहलीज पर आता है,
पत्नी की एक नजर में, सारा ताप जाता है।
"आज बड़ी दौड़ थी" - बस दो शब्द कह पाना,
जन्मों के सुकून का, एक साँस में आ जाना।

पति-पत्नी रथ के दो पहिये, घूमते-संभलते हैं,
कब चाँदी बालों में आई, पता ही नहीं चलते हैं।
पर नियति का हाथ क्रूर, एक पहिया हर लेता है,
एक को छोड़ यात्रा में, दूजे को तर लेता है।

फिर शुरू होती है, जीवन की कठिन परीक्षा,
सांसारिक नहीं, यह तो आत्मा की समीक्षा।
जो कंधा देता था सहारा, वो स्मृति हो जाता है,
जो हाथ थमाता था प्याला, चित्र में खो जाता है।

समाज का दर्पण निर्मम, सौ अर्थ निकालता है,
विधुर हँसे तो ताना, विधवा चले तो सवालता है।
हँसी भी यहाँ अपराध, मौन भी काट खाता है,
अपनों की ही भीड़ में, आदमी अकेला जाता है।

रसोई का स्वाद नहीं, टीवी पर चैनल नहीं अपना,
सोने-जागने पर भी, अब नहीं कोई सपना।
टोके तो कहें लोग, "उम्र में ये ज़िद कैसी",
सहे तो भीतर घुटे, पीड़ा है ये ऐसी।

ऐसे में मुक्ति का क्या, एक ही तो मार्ग है,
शून्य को भर दे जो, प्रभु का ही अनुराग है।
जब बंद हों दुनिया के कान, प्रार्थना सुन लेती है,
बिना कहे भी मन की, हर गाँठ खोल देती है।

जब अपने पराए लगें, 'वासुदेवः सर्वम्' याद करो,
सेवा, स्मृति, स्वाध्याय से, जीवन आबाद करो।
अकेलापन भी तप है, जो इसे स्वीकारता है,
वही तो तप कर कुंदन-सा, और निखरता है।

साथ केवल देह का नहीं, यादों का भी होता है,
छूटे हुए सपनों को, पूरा करने को होता है।

इसलिए साथी जब तक साथ है, सामान्य न मानो,
उसकी डाँट, मुस्कान को, जीवन-धन जानो।
और नियति ने यदि तुम्हें, अकेला कर डाला,
तो समझो प्रभु ने तुम्हें, खुद से जोड़ डाला।

ईश्वर, सेवा, स्मृति, स्वाध्याय - चार स्तंभ थाम ले,
इस जीवन की साँझ को, तू फिर सुबह मान ले।

जो हाथ छूट गया है, वो तारा बन जाता है,
अँधेरी राहों में वही, रोशनी दिखाता है।
जो साँसें शेष बचीं, उन्हीं से पथ सजाना है,
उसी के प्रकाश में, आगे बढ़ते जाना है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
45 minutes ago

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