"झुकता वही जिसमें जान है"
फलदार पेड़ ही झुकते हैं, सूखा कभी न झुके,
गुणवान ही नम्र बने, मूर्ख अकड़ से न झुके।
कदर तो किरदार की है, कद की नहीं,
साया भी कद में बड़ा है, पर उसमें बात नहीं।
उतार-चढ़ाव में जो साथ न छोड़े,
ऐसे यार की कदर कभी न छोड़े।
नाम, नसीब, नफा - सब ऊपर का खेल,
वो कब किसे क्या दे, उसकी ही है मेल।
संतोष से सोना, आशा से जाग,
स्वाभिमान से जीना, यही है जीवन का राग।
किस्मत बादशाह उसे ही बनाती,
जिसमें हुनर की चिंगारी सुलगती जाती।
सपने वो नहीं जो सोते में आए,
सपने वो हैं जो नींद ही चुराए।
तालाब एक है, पर सोच अलग है,
हंस चुने मोती, बगुले को मछली की ललक है।
सोच ही तो है जो बड़ा बनाती,
वरना भीड़ तो बस राहों में भटक जाती।
गुलाब बनना है तो काँटों से सीख,
तालमेल की कला में ही है जीत।
घमंड कैसा, किस बात का अभिमान,
जिंदगी एक किताब है, अंजान है हर पान।
अगले पन्ने पर क्या लिखा, किसे पता,
बस कर्म से लिखो, यही है सच्ची कथा।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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