"गुरु - जो कभी सेवानिवृत्त नहीं होता"
ये पद नहीं है सहज, ये तपस्या का सार है,
ग्रेजुएशन, परास्नातक, फिर अनुशासन अपार है।
शिक्षा-स्नातक की दीक्षा, मौन साधना जैसी है,
प्रतियोगी परीक्षा फिर, अग्नि-परीक्षा जैसी है।
तब जाकर मिलता है, गुरुता का सिंहासन,
जहाँ चॉक नहीं, चरित्र का होता शासन।
साप्ताहिक डायरी नहीं, ये यज्ञ की तैयारी है,
हर पृष्ठ पर लिखी, कल के भविष्य की लाचारी है।
घर से कंठस्थ कर ज्ञान, कक्षा में उतरना होता है,
भिन्न बुद्धि-लब्धि के दीयों को, एक लय से धरना होता है।
मंद बुद्धि को थामना, मेधावी को आकाश देना,
सबको साथ लेकर, ज्ञान का रास देना।
परिणाम यदि डगमगाए, तो विभाग से पहले,
आत्मा ही न्यायाधीश बन, हृदय को दहले।
"कहाँ चूक हुई मुझसे" - ये चिंतन रात भर है,
फिर नवाचार, नव-तकनीक, नव-प्राण का स्वर है।
इसी साधना में बीत जाती, उम्र की सारी पूँजी,
बच्चों के उत्साह में ही, खोजता अपनी कुंजी।
और फिर एक दिन, आदेश आता - "सेवा समाप्त",
जो दीप जलाता था, उसी पर तिमिर व्याप्त।
पर यह कैसा अवकाश? कैसी ये सेवानिवृत्ति है?
क्या सरस्वती का पुत्र, कभी पदच्युत होता है?
क्या गंगा का प्रवाह, तट बंधने से रुकता है?
क्या सूर्य का प्रकाश, साँझ ढलने से झुकता है?
नहीं! शिक्षक का अवकाश, देह का है, ज्ञान का नहीं,
यह विराम है नौकरी का, सम्मान का नहीं।
विद्यालय से मुक्त हुआ, समाज से मुक्त नहीं,
राष्ट्र-निर्माता का दायित्व, कभी सुप्त नहीं।
अब प्रारम्भ होता है, जीवन का द्वितीय अध्याय,
जहाँ न घंटी का बंधन, न निरीक्षण का भय।
अब गुरु, ऋषि बनता है, विश्राम में भी जाग्रत है,
उसका मौन भी अब, सहस्त्र शब्दों से मुखरित है।
अब उसका धर्म क्या हो, सुनो हे गुरुवर --
समाज की नींव हो तुम, स्तंभ अब भी तुम ही हो,
पथ भटके दीयों को, आलोक अब भी तुम ही हो।
नि:शुल्क पाठशाला बन, निर्धन को ज्ञान दो,
नवांकुर शिक्षकों को, अपना अनुभव-दान दो।
परिवार, जो रहा उपेक्षित, अब उसे समय दो,
पौत्रों की तुतली बोली में, वेदों की लय दो।
स्वास्थ्य ही ब्रह्म है, इसे अब पहचानो,
प्रातः भ्रमण, योग, प्राणायाम को जानो।
जो ग्रंथ अधूरे छूटे, अब उनका स्वाध्याय करो,
जो राग मन में दबे थे, उन्हें फिर से गुनगुनाओ।
अपनी आत्मकथा लिखो, ये अनुभव-ग्रंथ बनेगा,
तुम्हारा लिखा एक पृष्ठ, युगों तक पढ़ा जाएगा।
जिन किलों, महलों, वेदियों का, पाठ पढ़ाया था,
नक्शे पर उंगली रख, जिनका भेद बताया था।
अब स्वयं तीर्थ करो, उन धूलों को माथे लगाओ,
इतिहास को आँखों से देख, फिर से जीवंत बनाओ।
हे आचार्य! तुम रिटायर नहीं, री-टायर होते हो,
पुराने वस्त्र उतार, नव-ऊर्जा से होते हो।
तुम सरकारी सेवा से मुक्त हो, गुरु-धर्म से नहीं,
तुम्हारा अवकाश ही, तुम्हारा परम-उत्कर्ष सही।
-जगदीश प्रसाद शर्मा
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