माता-पिता का जाना, सबसे बड़ा गम है,
पर मन समझा लेता, ये नियति का क्रम है।
कभी जो बच्चा जाए, दिल चीर जाता है,
कर्मों का लेखा कह, मन सह जाता है।
दुःख कह-सुन कर, मन हल्का हो जाता है,
और टूटा जीवन, फिर पटरी पर आता है।
पर जब साथी बिछड़े, पीड़ा कुछ और है,
शब्दों से परे, अकेलेपन का शोर है।
भीड़ में भी तन्हा, अपनों में अधूरा है,
जो रह गया पीछे, वो भीतर से सिमटा है।
उस घड़ी में बस, एक ही सहारा है,
ईश्वर के सिवा, न कोई किनारा है।
बिछोह को जो समझे, ईश्वर की साधना है,
तभी तो दुःख भी, लगता आराधना है।
मेरा ये मानना, आत्माएं चुन कर आती हैं,
जन्म से पहले ही, अनुबंध बना जाती हैं।
किसको पहले जाना, किसको सहना है,
लेन-देन पुराना, कैसे चुकाना है।
ये पीड़ा भी शायद, विकास के लिए है,
एक आत्मा का बलिदान, दूसरे के लिए है।
जाना तो सबको है, ये अटल विधान है,
पर कितना प्रेम दिया, यही सच्चा मान है।
क्योंकि प्रेम ही तो, ईश्वर का रूप है,
इसी प्रेम से ही, आत्मा का स्वरूप है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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