"बस देखते जाना"
सुख-दुख आते-जाते, जैसे आँधी-तूफान,
तू बस देखता रह, तू है साक्षी महान।
लाभ-हानि, मान-अपमान, प्रकृति के खेल हैं,
तू इनसे परे है, ये तो मन के मेल हैं।।
तू कर्ता नहीं है, बस दृष्टा बन जा,
हर विचार को आते-जाते, देखता बन जा।
जैसे आकाश देखे, बादलों की दौड़ को,
वैसे आत्मा देखे, मन की होड़ को।।
जब तक कर्ता बना है, बंधन में पड़ा है,
मैं कर रहा हूँ - इस भ्रम में जकड़ा है।
कर्ता-भाव छोड़ा, तो मुक्ति द्वार खुला,
साक्षी हुआ तो सारा, संसार-भार धुला।।
न अपेक्षा किसी से, न शिकायत कोई,
साक्षी की दृष्टि में, द्वेष-राग नहीं कोई।
अष्टावक्र का ज्ञान, यही सार सिखाता,
जो देखता ही रहता, वही मुक्त हो जाता।।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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