आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बस देखते जाना

                
                                                         
                            "बस देखते जाना"
                                                                 
                            

सुख-दुख आते-जाते, जैसे आँधी-तूफान,
तू बस देखता रह, तू है साक्षी महान।
लाभ-हानि, मान-अपमान, प्रकृति के खेल हैं,
तू इनसे परे है, ये तो मन के मेल हैं।।

तू कर्ता नहीं है, बस दृष्टा बन जा,
हर विचार को आते-जाते, देखता बन जा।
जैसे आकाश देखे, बादलों की दौड़ को,
वैसे आत्मा देखे, मन की होड़ को।।

जब तक कर्ता बना है, बंधन में पड़ा है,
मैं कर रहा हूँ - इस भ्रम में जकड़ा है।
कर्ता-भाव छोड़ा, तो मुक्ति द्वार खुला,
साक्षी हुआ तो सारा, संसार-भार धुला।।

न अपेक्षा किसी से, न शिकायत कोई,
साक्षी की दृष्टि में, द्वेष-राग नहीं कोई।
अष्टावक्र का ज्ञान, यही सार सिखाता,
जो देखता ही रहता, वही मुक्त हो जाता।।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर