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ओ बदरा प्यारे

                
                                                         
                            मेरा छप्पर है पुराना,
                                                                 
                            
ओ बदरा प्यारे! तू कहीं और बरस जाना।।

टपकती हैं बूँदें, हर कोने से घर में,
भीगती है खटिया, पड़ी इक असर में,
ठिठुरती है बिटिया, न पूछो वो अफ़साना
ओ बदरा प्यारे! तू कहीं और बरस जाना।।

ग़ुरबत की गलियों में साँसें हैं चलती,
छत टपकती है, पर उम्मीद पलती,
मैं आँसू पी-पी के जीता ये ज़माना
ओ बदरा प्यारे! तू कहीं और बरस जाना।।

जेबें हों खाली, तो कोई नहीं अपना,
चमके जो सिक्का, वही रस्ता हो सपना,
हर रिश्ता बिकता है, पैसा है दीवाना
ओ बदरा प्यारे! तू कहीं और बरस जाना।।

चलती है गाड़ी जैसे-तैसे,
रोटी के पीछे भागें परदेसे,
पक्का मकान अब तो है इक अफ़साना
ओ बदरा प्यारे! तू कहीं और बरस जाना।।
-इस्लाम अली
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एक वर्ष पहले

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