उठा रहा है पर्दे हक़ीक़त के कोई,
ख़ुदा न करे बिछड़े ऐसे कोई।
जाते हुए इक नज़र भर के भी नहीं देखा,
देखती रही भरी आंखों से सूनी राहों में कोई।
हवा में अब भी हैं उसकी गर्म सांसों की खुशबू,
मगर दरवाज़े पे दस्तक दे क्यों न कोई।
रातें मेरी होती थी रोशन जिससे,
एक चिंगारी से दिए भुझा गया कोई।
कभी जिसका नाम भी मेरे साथ था,
आज उसकी उम्मीद का भी साथ नहीं कोई।
मैं लुटा आई थी अपना सब उसकी मोहब्बत में,
वो कह रहा था, मेरे लिए अब कुछ नहीं कोई।
न जाने कब तलक रहेगा अब ये आलम,
मैं पुकारूंगी उसे, और होगा नहीं कोई।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X