तेरे दरबार में आकर जो मैंने की गदाई है।
तेरे दर की फ़कीरी में ही सारी बादशाही है।।
तू अपने आप से मुझको फ़क़त मंसूब ही कर ले।
तेरे कब्जे में ऐ मालिक ये सारी खुदाई है।।
तेरी जानिब से आए हैं तेरी जानिब को जाना है।
सफ़र हैं जिंदगी अपनी , यहीं तालीम पाई है।।
लिखा है नाम को तेरे तुझी को याद रखा है।
मेरे सारे खजाने में वक़्त ये ही कमाई है।।
सकूं है नाम में तेरे ये भी तूने बताया है।
मैं हूं बस ख़ाक का बंदा और तू इलाही है।।
मुहब्बत है मुझे तेरे हर एक नाम से अल्लाह।
तुझे ग़र छोड़ दे"मेंहदी"तो फिर उसकी तबाही है।।
-इक़बाल मेंहदी काजमी
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